हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, लाहौर में आयतुल्लाह हाफ़िज़ सय्यद रियाज़ हुसैन नजफ़ी ने कहा कि ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद दुश्मन को यक़ीन हो गया है कि शिया समुदाय की सबसे बड़ी ताक़त मरजइयत है, जिसने तशय्युअ की रक्षा की है। दूसरी बड़ी ताक़त अज़ादारी और तीसरी ताक़त विलायत-ए-अमीरुल मोमिनीन है, जो तशय्युअ की सबसे मज़बूत और रक्षक ताक़त है। इन तीन ताक़तों के कारण आज का शिया समुदाय साम्राज्यवाद के सामने डटकर खड़ा है। यही वजह है कि साम्राज्यवादी ताक़तें इन तीनों ताक़तों के ख़िलाफ़ लगातार साज़िशें करती रहती हैं, ताकि तशय्युअ को कमज़ोर किया जा सके।
जामे मस्जिद अली, हौज़ा-ए-इल्मिया जामेअतुल-मुंतज़िर में ख़ुत्बा-ए-जुमा देते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान सदी मुसलमानों की सदी है। इस्लाम तेज़ी से फैलने वाला धर्म है और आज मुसलमान तरक़्क़ी कर रहा है। क़ुरआन और हदीस से साबित है कि आने वाले समय में ब्रिटेन और यूरोप में भी मुसलमानों का शासन होगा।
उन्होंने कहा कि कर्बला धर्म की रक्षा और उसके अस्तित्व को बनाए रखने का नाम है। कर्बला की याद हज़रत इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के दौर में अपने चरम पर थी। दोनों इमाम शायरों को मजालिस-ए-अज़ा में बुलाते, उनसे शेर सुनते और उन्हें इनाम भी देते थे। यानी कर्बला के ज़िक्र को जीवित रखने के लिए सबसे पहले इन्हीं दो बुज़ुर्ग हस्तियों ने ज़रूरी साधन उपलब्ध कराए। यही वजह है कि आज दुनिया के कोने-कोने में कर्बला का ज़िक्र होता है।
हाफ़िज़ रियाज़ नजफ़ी ने कहा कि इज्तिहाद की बुनियाद भी इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के दौर में पड़ी। उन्होंने अपने शागिर्दों को क़ुरआन और हदीस से धार्मिक आदेश निकालना सिखाया। उनके शागिर्द फ़िक़्ह के विशेषज्ञ थे। रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम ने मस्जिद-ए-नबवी से जिस शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत की थी, इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने उसे विश्वविद्यालय के स्तर तक पहुँचा दिया। उनके दर्स में लगभग चार हज़ार लोग शामिल होते थे, जिनमें हिंद और सिंध के विद्यार्थी भी थे।
उन्होंने कहा कि रसायन विज्ञान के जनक जाबिर बिन हय्यान को आज की विज्ञान की दुनिया में विज्ञान के जनकों में गिना जाता है। आज की वैज्ञानिक तरक़्क़ी उनके योगदान की देन है। जाबिर बिन हय्यान इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के शागिर्द थे।
उन्होंने कहा कि 17 रबीउल अव्वल को पैग़म्बर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की विलादत-ए-बासआदत हुई। रबीउल अव्वल ख़ुशियों का महीना है। इसी महीने में मक्का से मदीना की हिजरत हुई और इसी महीने में मुआख़ात-ए-मदीना यानी मुहाजिरों और अंसार के बीच भाईचारे की स्थापना भी हुई।
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